समुद्र को दूर से देखना जितना खूबसूरत लगता है, उसके अंदर जाकर वहां मौजूद प्लास्टिक, मछली पकड़ने के पुराने जाल और समुद्री जीवों की परेशानियों को देखना उतना ही डरावना हो सकता है। चेन्नई की रहने वाली थारागई आराधना ने बहुत छोटी उम्र में समुद्र की इसी हकीकत को देखा और फिर इसे साफ करने तथा समुद्री जीवों को बचाने को अपने जीवन का मिशन बना लिया।

आज 12 साल की थारागई आराधना समुद्री सफाई, स्कूबा डाइविंग, तैराकी और पर्यावरण जागरूकता के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने छोटी उम्र में ही समुद्र की गहराइयों में जाकर वहां से प्लास्टिक और मछली पकड़ने के जाल निकालने का काम शुरू कर दिया था। उनकी कहानी इसलिए खास है क्योंकि उन्होंने अपनी उम्र को कभी अपने रास्ते की रुकावट नहीं बनने दिया।

समुद्र से बचपन से ही जुड़ाव

थारागई का समुद्र से रिश्ता बहुत छोटी उम्र से शुरू हो गया था। उनके पिता अरविंद थारुनश्री स्कूबा डाइविंग प्रशिक्षक हैं और समुद्री संरक्षण से भी जुड़े हुए हैं। उन्होंने अपनी बेटी को बचपन से ही पानी और तैराकी से परिचित कराया।

धीरे-धीरे थारागई ने तैराकी सीखी और फिर स्कूबा डाइविंग में भी उनकी रुचि बढ़ने लगी। करीब पांच साल की उम्र में उन्होंने उथले पानी में स्कूबा डाइविंग की शुरुआती ट्रेनिंग शुरू की। इस तरह समुद्र उनके लिए सिर्फ घूमने की जगह नहीं रहा, बल्कि उनके जीवन का हिस्सा बन गया।

पिता को देखकर मिली समुद्र बचाने की प्रेरणा

थारागई ने अपने पिता को समुद्र और समुद्र तटों से प्लास्टिक तथा दूसरे कचरे को निकालते हुए देखा था। जब उन्होंने पूछा कि वह ऐसा क्यों करते हैं, तो उन्हें बताया गया कि समुद्र में पड़ा प्लास्टिक और मछली पकड़ने का कचरा समुद्री जीवों के लिए कितना खतरनाक हो सकता है।

इसके बाद थारागई भी अपने पिता के साथ समुद्र की सफाई में शामिल होने लगीं। दोनों समुद्र और समुद्र तटों से कचरा इकट्ठा करते और उसे अलग-अलग करके उपयोगी सामग्री को पुनर्चक्रण के लिए भेजने की कोशिश करते।

यहीं से एक छोटी बच्ची की दिलचस्पी धीरे-धीरे एक बड़े पर्यावरण अभियान में बदलने लगी।

एक डुगोंग की मौत ने बदल दी सोच

थारागई की कहानी में एक घटना का खास महत्व बताया जाता है। जब वह करीब पांच साल की थीं, तब उन्होंने समुद्र में एक डुगोंग, जिसे समुद्री गाय भी कहा जाता है, को मछली पकड़ने वाले जाल में फंसा हुआ देखा।

जिस जाल में वह फंसा था, उसे आमतौर पर घोस्ट नेट यानी छोड़ा हुआ मछली पकड़ने का जाल कहा जाता है। ऐसे पुराने जाल समुद्र में लंबे समय तक तैरते रहते हैं और कई बार समुद्री जीव इनमें फंस जाते हैं।

रिपोर्टों के मुताबिक, उस घटना में मां डुगोंग की जान नहीं बच सकी, जबकि उसका बच्चा बच गया। इस घटना का थारागई पर गहरा असर पड़ा।

इसके बाद उन्हें एहसास हुआ कि समुद्र में फेंका गया एक छोटा सा जाल या प्लास्टिक का टुकड़ा भी किसी समुद्री जीव के लिए जानलेवा हो सकता है। इसी के बाद समुद्र को साफ करने और समुद्री जीवों को बचाने का उनका संकल्प और मजबूत हुआ।

समुद्र में उतरकर खुद निकालती हैं कचरा

थारागई सिर्फ लोगों को समुद्र बचाने की सलाह नहीं देतीं, बल्कि खुद समुद्र में उतरकर सफाई अभियानों में हिस्सा लेती हैं।

स्कूबा डाइविंग के दौरान वह समुद्र के अंदर पड़े प्लास्टिक कचरे, पुराने मछली पकड़ने के जाल और दूसरे कचरे को निकालने में मदद करती हैं। कई बार यह काम आसान नहीं होता, क्योंकि पानी के अंदर दिखाई देना मुश्किल हो सकता है और भारी या उलझे हुए जाल को निकालना चुनौतीपूर्ण होता है।

उनके पिता भी इस काम में उनका साथ देते हैं और कई गतिविधियों में दोनों पिता-बेटी की टीम के रूप में नजर आते हैं।

7,000 किलो से ज्यादा कचरा हटाने का दावा

थारागई के समुद्र सफाई अभियान को लेकर अलग-अलग वर्षों में अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं। शुरुआती रिपोर्टों में कुछ सौ किलो प्लास्टिक कचरा हटाने की बात कही गई थी, जबकि बाद की रिपोर्टों में यह आंकड़ा हजारों किलो तक पहुंच गया।

हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, थारागई के प्रयासों से 7,000 किलो से ज्यादा प्लास्टिक कचरा और छोड़े गए मछली पकड़ने के जाल हटाने में योगदान दिया जा चुका है।

हालांकि अलग-अलग समय की रिपोर्टों में अलग-अलग आंकड़े बताए गए हैं। इसलिए इसे उनके लंबे समय से चल रहे समुद्र सफाई अभियान से जुड़ा हालिया बताया गया आंकड़ा समझना ज्यादा सही होगा।

100 से ज्यादा बार समुद्र में स्कूबा डाइविंग

थारागई ने बहुत छोटी उम्र में स्कूबा डाइविंग शुरू की और समय के साथ उनके डाइव की संख्या भी बढ़ती गई।

हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, वह 100 से ज्यादा बार स्कूबा डाइविंग कर चुकी हैं। इन डाइव का उद्देश्य केवल तैराकी या रोमांच नहीं रहा, बल्कि समुद्री जीवन को करीब से समझना और पानी के अंदर मौजूद प्रदूषण के बारे में लोगों को जागरूक करना भी रहा है।

उनके लिए स्कूबा डाइविंग एक ऐसा माध्यम बन गया, जिसके जरिए वह लोगों को दिखा सकें कि समुद्र की सतह के नीचे वास्तव में क्या हो रहा है।

8 साल की उम्र में 19 किलोमीटर की तैराकी

थारागई ने तैराकी को भी पर्यावरण जागरूकता का माध्यम बनाया। जब वह सिर्फ 8 साल की थीं, तब उन्होंने करीब 19 किलोमीटर की खुले समुद्र में तैराकी की।

यह तैराकी कोवलोंग से नीलांकरई के बीच की गई थी और इसका उद्देश्य समुद्र को बचाने तथा समुद्री प्रदूषण के प्रति लोगों को जागरूक करना था।

इतनी कम उम्र में खुले समुद्र में इतनी लंबी दूरी तक तैरना अपने आप में बड़ी चुनौती थी। इस दौरान उन्हें मौसम, थकान, शरीर में ऐंठन और जेलीफिश जैसी परेशानियों का भी सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपना अभियान पूरा किया।

श्रीलंका से भारत तक तैरकर पार किया पाल्क स्ट्रेट

थारागई ने इसके बाद एक और बड़ा अभियान किया। अप्रैल 2024 में उन्होंने अपने पिता अरविंद थारुनश्री और अपने छोटे भाई निश्विक के साथ श्रीलंका के थलाइमन्नार से भारत के धनुषकोडी तक पाल्क स्ट्रेट में तैराकी की।

यह लगभग 30 किलोमीटर का समुद्री रास्ता था और इस अभियान का उद्देश्य समुद्री प्रदूषण तथा समुद्री जीवों की सुरक्षा को लेकर जागरूकता फैलाना था।

इस अभियान में उनके साथ सुरक्षा दल भी मौजूद था। पिता और बेटी की इस तैराकी ने लोगों का ध्यान समुद्री प्रदूषण और समुद्री संरक्षण की ओर खींचा।

भारत की सबसे कम उम्र की प्रमाणित जूनियर गोताखोरों में शामिल

थारागई की डाइविंग यात्रा में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि तब आई, जब उन्हें पीएडीआई जूनियर ओपन वॉटर स्कूबा डाइवर प्रमाणपत्र मिला।

कम उम्र में इस तरह का प्रमाणपत्र हासिल करना उनकी डाइविंग ट्रेनिंग का महत्वपूर्ण हिस्सा था। इसके बाद उन्होंने और ज्यादा व्यवस्थित तरीके से डाइविंग और समुद्र संरक्षण से जुड़ी गतिविधियों में हिस्सा लेना जारी रखा।

पानी के अंदर भरतनाट्यम करके दिया संदेश

थारागई की सबसे अनोखी कोशिशों में से एक है उनका पानी के अंदर भरतनाट्यम प्रदर्शन

उन्होंने समुद्र के अंदर करीब 20 फीट की गहराई में भरतनाट्यम किया। पारंपरिक पोशाक और आभूषणों के साथ उन्होंने पानी के अंदर नृत्य किया।

लेकिन इसका मकसद सिर्फ एक अलग तरह का प्रदर्शन करना नहीं था। इसके जरिए उन्होंने समुद्र में बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण के खिलाफ लोगों को जागरूक करने की कोशिश की।

जहां भरतनाट्यम आमतौर पर मंच पर किया जाता है, वहीं थारागई ने समुद्र को ही अपना मंच बना दिया। उनका संदेश था कि अगर हम समुद्र को प्लास्टिक से भरते रहे, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए समुद्री जीवों और पूरे समुद्री पर्यावरण को बचाना मुश्किल हो जाएगा।

क्या थारागई की अपनी कोई टीम है?

थारागई के काम को सिर्फ एक बच्ची के अकेले किए गए अभियान के तौर पर देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। उनके पर्यावरण अभियान में उनके पिता अरविंद थारुनश्री की बहुत बड़ी भूमिका है।

कई समुद्र सफाई और तैराकी अभियानों में पिता और बेटी साथ नजर आते हैं। बड़े समुद्री अभियानों के दौरान उनके साथ सुरक्षा दल, तैराक, गोताखोर और जरूरत के अनुसार तटरक्षक बल तथा समुद्री पुलिस का सहयोग भी रहा है।

इसलिए थारागई को एक बड़ी स्वतंत्र संस्था चलाने वाली पर्यावरण कार्यकर्ता के बजाय अपने पिता और अलग-अलग संरक्षण तथा सुरक्षा टीमों के साथ काम करने वाली युवा पर्यावरण कार्यकर्ता के रूप में समझना ज्यादा सही होगा।

दूसरे बच्चों को भी जागरूक करती हैं

थारागई का काम सिर्फ खुद समुद्र में जाकर कचरा निकालने तक सीमित नहीं है। वह दूसरे बच्चों और लोगों को भी पर्यावरण संरक्षण के बारे में जागरूक करने की कोशिश करती हैं।

स्कूलों में जागरूकता कार्यक्रमों और प्रस्तुतियों के जरिए वह बच्चों को बताती हैं कि प्लास्टिक प्रदूषण का असर सिर्फ समुद्र के पानी पर नहीं पड़ता। इसका सीधा असर मछलियों, कछुओं, डुगोंग और दूसरे समुद्री जीवों पर भी पड़ सकता है।

उनकी कोशिश यह समझाने की है कि अगर बचपन से ही बच्चों को प्रकृति और समुद्र की जिम्मेदारी समझाई जाए, तो आने वाले समय में प्रदूषण को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

उनका मकसद सिर्फ रिकॉर्ड बनाना नहीं

थारागई के नाम से कई तैराकी और डाइविंग उपलब्धियां जुड़ी हैं, लेकिन उनके काम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा कोई रिकॉर्ड नहीं, बल्कि जागरूकता फैलाना है।

चाहे 19 किलोमीटर की तैराकी हो, पाल्क स्ट्रेट पार करना हो, स्कूबा डाइविंग हो या पानी के अंदर भरतनाट्यम—इन सभी गतिविधियों के पीछे एक ही संदेश है कि समुद्र को कचरे का डिब्बा नहीं बनाया जा सकता।

उनका संदेश है कि समुद्र में फेंकी गई प्लास्टिक की बोतल या मछली पकड़ने का जाल सिर्फ कचरा नहीं है। यह किसी समुद्री जीव के लिए जान का खतरा बन सकता है।

छोटी उम्र में बड़ी जिम्मेदारी

आज 12 साल की उम्र में थारागई ने यह दिखाया है कि किसी बदलाव के लिए उम्र का बड़ा होना जरूरी नहीं है।

उन्होंने समुद्र के अंदर जाकर प्रदूषण देखा, समुद्री जीवों को खतरे में देखा और फिर सिर्फ शिकायत करने के बजाय खुद कुछ करने का फैसला किया।

उनकी कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि पर्यावरण की रक्षा सिर्फ सरकार या बड़ी संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है। आम लोग भी अपनी रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतों से प्रकृति को होने वाले नुकसान को कम कर सकते हैं।

समुद्र तट पर कचरा न छोड़ना, प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करना और दूसरे लोगों को भी इसके लिए जागरूक करना जैसी छोटी कोशिशें भी बहुत महत्वपूर्ण हैं।

थारागई की कहानी से क्या सीख मिलती है?

थारागई आराधना की कहानी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि बदलाव के लिए हमेशा कोई बहुत बड़ा काम करना जरूरी नहीं होता।

एक बच्ची ने अपने पिता के साथ समुद्र से प्लास्टिक उठाना शुरू किया। फिर उसने स्कूबा डाइविंग सीखी, समुद्र के अंदर जाकर सफाई की, तैराकी के जरिए जागरूकता फैलाई और भरतनाट्यम जैसी कला को भी पर्यावरण के संदेश का माध्यम बना दिया।

आज उनकी कहानी हजारों लोगों तक पहुंच रही है और यही शायद उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।

प्रकृति को बचाने के लिए हर किसी को ओशन वॉरियर बनने की जरूरत नहीं है। बस इतना जरूरी है कि हम अपने हिस्से का कचरा प्रकृति के घर में न छोड़ें। 🌊❤️

क्योंकि बदलाव के लिए हमेशा बड़ा काम नहीं, छोटी सी जिम्मेदारी और थोड़ी सी इंसानियत भी काफी होती है।